परदे के पीछे क्या है ?

परदे के पीछे क्या है ?

Friday, May 25, 2012

सम्वेदनात्मक ज्ञान की भेदक क्षमता और मीडिया के सदुपयोग का उदाहरण


सत्यमेव जयते
सम्वेदनात्मक ज्ञान की भेदक क्षमता और मीडिया के सदुपयोग का उदाहरण
वीरेन्द्र जैन
      जयप्रकाश आन्दोलन और इमरजैंसी के दौरान अपनी गज़लों के माध्यम से पूरे समाज को झकझोर देने वाले शायर दुष्यंत कुमार का एक शे’र है-

                   वे मुतमईन हैं पत्थर पिघल नहीं सकता
                   मैं बेकरार हूं आवाज़ में असर के लिए
आमिर खान द्वारा तैयार कार्यक्रम ‘सत्यमेव जयते’ ने एक बार फिर दूरदर्शन को, बुनियाद, हमलोग, महाभारत, भारत एक खोज, तमस, आदि सीरियलों के उस दौर में पहुँचा दिया है जहाँ सम्वेदना के साथ ज्ञान का समन्वय करके देश के बड़े मध्यम वर्ग तक समाज को सार्थक दिशा में बदलने का सन्देश दिया जाता रहा है। आज इस माध्यम में रंग हैं और निखार है और इसकी पहुँच दूर दूर तक है। अगर आप कोई समझदारी भरी बात दिल को छू लेने वाली भाषा और अन्दाज़ में करते हैं तो ऐसा नहीं है कि समाज में परिवर्तन के वे बीज न बोये जा सकें जो अभी दिमागों में कुण्ठित हो कर दम तोड़ देते हैं। वैसे भी वे अपने सन्देशों के साकार परिणाम चाहते हैं, इसलिए उनका कथन भी है कि-
               सिर्फ हंगामा खड़ा करना मिरा मकसद नहीं
               मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
 अमिर खान के इस कार्यक्रम के अब तक प्रसारित अंकों को जो लोकप्रियता मिली है, वह इस बात की संकेतक है कि आमिर के एपीसोडों से सम्बन्धित भावनाएं देशवासियों के मानस पटल पर निरंतर दस्तक देती रही हैं पर उन्हें आन्दोलन में बदल उनके अग्रदूत बनकर झंडा उठाने का साहस कोई नहीं जुटा पा रहा था। आमिर ने वह दुस्साहस किया और देश का समर्थन हासिल किया है। कोई बात उसी समय लोकप्रिय होती है जब वह पूर्व से ही लोगों के मन में छायी होती है पर उसका श्रेय उस बात को शब्द देने वाले उस व्यक्ति को मिलता है, जो असफलता की सम्भावना से भयभीत हुये बिना आगे आता है। मिर्ज़ा गालिब ने कहा है-

               देखिए तकरीर की लज्जत कि जो उसने कहा
               मैंने यह जाना कि गोया यह भी मेरे दिल में है  
      आमिरखान एक प्रयोगधर्मी संस्कृतिकर्मी हैं। पिछले दिनों उन्होंने ‘रंग दे बसंती’, ‘फना’, ‘तारे जमीं पर’, ‘पीपली लाइव’, ‘थ्री ईडियट्स’ आदि फिल्में बनाकर यह साबित किया था कि उनमें न केवल नये विषय चुनने की तमीज है अपितु देश और समाज के हित में उन आफबीट विषय पर फिल्में बना कर व्यावसायिक खतरा मोल लेने की हिम्मत भी है। किसी बात के कहने का महत्व इस बात पर भी निर्भर करता है कि उसे कौन कह रहा है, क्योंकि उस के व्यक्तित्व के आधार पर ही उसे कहने का अधिकार प्राप्त होता है। इस मामले में साधु द्वारा बच्चे को गुड़ न खाने की सलाह देने के पहले पन्द्रह दिन का समय लेने की लोककथा बहुत प्रचलित है जिसमें साधु ने पहले सलाह देने की पात्रता प्राप्त की थी तब बच्चे को सलाह दी थी। उल्लेखनीय है कि उपरोक्त फिल्में बनाकर आमिर खान ने ‘सत्यमेव जयते’ बनाने की पात्रता पायी है और वे सन्देश देने में सफल भी रहे हैं।
      उन की लोकप्रियता आज के दो दूसरे सुपर स्टार अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान से होड़ लेती है। किंतु इन शिखर के कलाकारों ने कुछ बहुत अच्छी और आदर्श फिल्में करने के बाबजूद जिस तरह के व्यावसायिक समझौते किये उससे वे किसी आदर्श को सामने रखने के हक़दार नहीं रह गये। उन्होंने केवल कहानी पर अभिनय किया है किंतु आमिर ने सच्ची घटनाओं से समस्याओं को उठाया है और समाधान के स्तर तक ले जाने की प्रेरणा दे रहे हैं। अमिताभ बच्चन की सफलता में उनके परिवार की श्रीमती इन्दिरा गान्धी के परिवार से मित्रता की भी बड़ी भूमिका रही है और बाद के समय में अमिताभ बच्चन और राजीव गान्धी की मित्रता जग जाहिर रही है। राजीव गान्धी ने जब सोनिया गान्धी से शादी की थी तब सोनिया परिवार का निवास श्री हरिवंश राय बच्चन का बंगला ही बनाया गया था जो उस समय राज्यसभा के मानद सदस्य थे। सोनिया गान्धी के हाथों में मेंहदी रचाने का काम श्रीमती तेज़ी बच्चन ने किया था। राजीव गान्धी को चुनावी सफलता दिलाने के लिए अमिताभ ने इलाहाबाद से लोकसभा का चुनाव लड़ा था और हेमवती नन्दन बहुगुणा जैसे कद्दावर नेता को अपनी फिल्मी लोकप्रियता से हरा कर चुनावों को गैर राजनीतिक और मुद्दाविहीन बनाने की शुरुआत की थी। बाद में बोफोर्स तोप सौदों की खरीद पर लगे आरोपों में उनके और उनके भाई अजिताभ का नाम भी इसलिए उछाला गया था ताकि राजीव को कमजोर किया जा सके। अमिताभ बच्चन एक प्रतिष्ठित साहित्यिक परिवार से आते हैं और फिल्मों से की गयी कमाई को उन्होंने कई तरह के उद्योग धन्धों में लगाया जिनमें उन्हें नुकसान भी हुआ, पर उन्होंने कभी धन का स्तेमाल आमिर की तरह के सामाजिक सोद्देश्यतापूर्ण संस्कृतिकर्म में नहीं किया। व्यवसाय में नुकसान होने पर वे अमर सिंह की सलाह पर चलने लगे और समाज को भटकाने वाली विज्ञापन फिल्में करने लगे। उन्होंने एक ओर समाजवादी पार्टी के लिए उस समय काम किया जब उसकी सरकार अव्यवस्था के कारण बहुत बदनाम हो रही थी जिससे उनकी लोकप्रियता पर फर्क पड़ा। इनकम टैक्स विभाग इलाहाबाद से नोटिस मिलने पर जब समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने विभाग पर हमला कर दिया और कार्यालय में तोड़फोड़ कर दी तो उन्होंने अफसोस जताने की जरूरत नहीं समझी। आज भी वे एक ओर तो अस्पताल में जाकर बीमार अमर सिंह के गले लग कर रोने का अभिनय करते हैं जो सार्वजनिक रूप से मुलायम के मरने की दुआ करते हैं, वहीं दूसरी ओर अपनी पत्नी श्रीमती जया बच्चन को समाजवादी पार्टी की ओर से राज्यसभा में दुबारा भेजते हैं। समाजवादी पार्टी से अपनी पत्नी को सांसद बनवाने के बाबजूद वे उस भाजपा शासित गुजरात के ब्रान्ड एम्बेसडर बनना स्वीकार कर लेते हैं जिसकी करतूतों का विरोध करने के कारण ही समाजवादी पार्टी अपनी जीत सुनिश्चित कर पाती है। लगभग ऐसा ही हाल आईपीएल में अपनी टीम उतारने वाले शाहरुख खान का भी है जो सुर्खियों में बने रहने के लिए तरह तरह के तमाशे करते रहते हैं। यही कारण है कि इस समय फिल्मों के तीन सुपर स्टारों में से आमिर का कद समाज में सबसे ऊंचा बना हुआ है।
      आमिर के काम और उसके कद को उनके विरोधियों के चरित्र से भी नापा जा सकता है। स्मरणीय है कि जिन कार्लमार्क्स के बारे में डा. राधा कृष्णन ने कहा है कि
मार्क्स इस युग के ईसा मसीह हैं उनकी अंतिम यात्रा में कुल 29 लोग थे। दफनाते समय जब उनके घनिष्ठ मित्र और सहयोगी एंजिल ने कहा कि हम इस दौर के सबसे महान व्यक्ति को दफना रहे हैं तो एंजिल के एक मित्र ने बाद में पूछा कि जिस व्यक्ति के अंतिम संस्कार में कुल 29 लोग थे उसे सबसे महान व्यक्ति कैसे कहा जा सकता है। एंजिल ने उत्तर दिया कि यह भी देखो कि उसके विरोध में दुनिया के कितने लोग हैं! बाद में उनकी बात सच साबित हुयी। इसी तरह आमिर खान के इस काम को जहाँ एक ओर आम भारतीय मध्यम वर्ग का व्यापक समर्थन मिल रहा है वहीं एक खास वर्ग उनका विरोध भी कर रहा है। यह वह वर्ग है जिस पर न केवल आपराधिक आरोप हैं अपितु जो कानून के रन्ध्रों में से निकल कर अपने आप को सजाओं से बचाये हुये हैं। आमिर खान का मुखर विरोध करने वालों में बाबा रामदेव प्रमुख रूप से सामने आये हैं और उन्होंने कहा है कि आमिर यह काम केवल पैसे बनाने के लिए कर रहे है। रोचक यह है कि यह बात वह व्यक्ति कह रहा है जिसने कुल पन्द्रह साल में ग्यारह सौ करोड़ से अधिक की सम्पत्ति बनायी है और जिसको हाल ही में करोड़ों रुपये टक्स न चुकाने के लिए नोटिस मिले हैं। दूसरी ओर अपने दुहरे चरित्र के लिए जाने जाने वाले संघ परिवार के वे संगठन हैं जो छद्म रूप से काम करते हैं, उनके छद्म खातों वाले फेसबुकिये आमिर की पूर्व पत्नी से हुए तलाक के मामले को उठाने, और कार्यक्रम में धन का हिसाब किताब लगाने में लग गये हैं। सच तो यह है कि सत्यमेव जयते नाम से ही वे लोग घबराते हैं जिनकी सारी राजनीति ही झूठ और धोखे पर टिकी होती है। वे भयभीत हैं कि कहीं सच को सामने लाने वाला यह कार्यक्रम, बाबरी मस्जिद ध्वंस, गुजरात में मुसलमानों का नरसंहार, नेताओं के चारित्रिक पतन, राज्य सरकारों के भ्रष्टाचार, साधु साध्वियों के भेष में रह कर किये गये आतंकी कारनामों, और उनके आरोप दूसरी जमात के लोगों पर मड़ने के सच को न सामने लाने लगे।
      स्मरणीय है कि समाज में परिवर्तन चाहने वाली यह वही जनता है जो भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने पर अन्ना हजारे और बाबा रामदेव तक के पीछे जाने को उतावली बैठी रही है। अब जब उसे स्वयं कुछ सार्थक करने के अवसर मिल रहे हैं तो वह दूसरों पर निर्भर होने की जगह खुद ही कुछ सार्थक करके देखने के सन्देश से प्रभावित होगी। यदि यह अभियान सफल रहा तो बहुत समय बाद  सांस्कृतिक अभियान से समाज परिवर्तन का बड़ा प्रयोग होगा। समाज के प्रति चिंतित सभी शक्तियों को इस अभियान, कार्यक्रम और उसकी सफलता की कहानियों पर नजर रखनी चाहिए और संतुष्ट होने पर इसे सहयोग देना चाहिए।   
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629
    

Friday, May 18, 2012

भाजपा में मनमानी से संघ की अकड़ ढीली पड़ गयी है


    भाजपा में मनमानी से संघ की अकड़ ढीली हो गयी है
                                                                        वीरेन्द्र जैन
        आरएसएस और भाजपा के सम्बन्ध कुछ कुछ अवैध सम्बन्धों जैसे हैं जिन्हें दिन के उजाले में छुपाये रखा जाता है किंतु अँधेरे में बनाये रखा जाता है। किंतु इनका यह सत्य भी ऐसे ही जग जाहिर है जैसा कि रहीम ने एक दोहे में कहा है-
                खैर, खून, खाँसी, खुशी, बैर, प्रीति, मदपान
                रहिमन दाबे न दबे, जानत सकल जहान
      स्मरणीय है कि जब महात्मा गान्धी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था तब इस प्रतिबन्ध से मुक्ति के लिए उसके पदाधिकारियों ने केन्द्र सरकार के समक्ष अपने संगठन को शुद्ध सांस्कृतिक संगठन बताते हुए वादा किया था कि वह कभी राजनीति में भाग नहीं लेगा। जब इस आश्वासन के बाद उस पर से प्रतिबन्ध हटा लिया गया तो उसने कुछ ही दिन बाद राजनीतिक दल गठन करने के लिए अपने स्वयं सेवक भेज दिये जिनमें दीनदयाल उपाध्याय, कुशा भाऊ ठाकरे, सुन्दर सिंह भंडारी, कैलाशपति मिश्र, अटल बिहारी वाजपेयी, व लाल कृष्ण आडवाणी भी सम्मलित थे। तब से ही संघ दुहरा खेल खेल रहा है। जहाँ एक ओर वह कहता है कि उसे जनसंघ, जिसका परिवर्तित नाम भारतीय जनता पार्टी है, की कार्यप्रणाली से कोई मतलब नहीं है और उसके स्वयं सेवकों में तो सभी दलों के सदस्य हैं, वहीं दूसरी ओर वह केवल भाजपा की छोटी से छोटी बात में दखल देता रहा है व सारी गतिविधियां उसके निर्देश में ही चलती हैं। इतना ही नहीं नियंत्रण बनाये रखने के लिए भाजपा में ब्लाक से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक संगठन मंत्री के सारे पद केवल संघ प्रचारकों के लिए आरक्षित कर रखे हैं। संघ के स्वयं सेवक ही चुनावों में भाजपा की रीढ रहे हैं और अपने प्रारम्भिक चुनाव उन्होंने इसी पूंजी की दम पर लड़े हैं, और इसी के प्रभाव के अनुपात में सीटें जीती हैं। भाजपा के सारे बड़े नेता मौके ब मौके अपने को स्वयं सेवक बतलाते रहते हैं और उनके गणवेष में समारोहों में शामिल होते रहते हैं। असंतुष्ट होने पर संघ के एक निर्देश पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से अडवाणी जैसे वरिष्ठतम नेता को दूध में पड़ी मक्खी की तरह अलग कर दिया जाता है, और संघ के निर्देश पर ही राष्ट्रीय स्तर पर अज्ञात नितिन गडकरी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया जाता है। दोनों ही मामलों में कार्यकारिणी अचम्भे से देखती हुयी केवल सहमति देने को विवश होती है। संघ के निर्देश पर ही जसवंत सिंह जैसे वरिष्ठ नेता को विपक्षी नेता का पद नहीं दिया जाता और संघ के आदेश पर ही पार्टी से खुला विद्रोह करने वाली उमा भारती को पार्टी में पुनर्प्रवेश दिया जाया है।
राष्ट्रीय समाचार पत्रों में पिछले दो एक महीने में छपे समाचारों के शीर्षक सारी कहानी कहते हैं
·         21मार्च 2012- संघ प्रमुख ने लगाई गडकरी की क्लास , भागवत का आदेश, कर्नाटक संकट जल्द निपटाएं। नागपुर/नई दिल्ली संघ के प्रमुख मोहन भागवत और सरकार्यवाह भैय्याजी जोशी ने भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी की क्लास ली। मंगलवार को तीन घंटे चली मैराथन बैठक में दोनों शीर्ष पदाधिकारियों ने लम्बे समय से चले आ रहे कर्नाटक को सुलझाने में असफल रहने पर गडकरी से स्पष्टीकण मांगा और इस मामले को जल्दी ही पटाक्षेप करने को कहा। राज्यसभा के उम्मीदवारों में नागपुर के अजय संचेती, और म.प्र. में नजमा हेपतुल्ला के चयन पर भी असंतोष जताया।...........
·         18मार्च2012- संघ ने दी भाजपा को नसीहत, विधानसभा चुनावों में मिला हार से नाखुश। नईदिल्ली, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भाजपा के विधानसभा चुनावों में खराब प्रदर्शन से खासा नाखुश है। उन्होंने कहा है कि भाजपा को इस सवाल का जबाब ढूंढना चाहिए कि सांगठनिक ढांचा और वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के एक मजबूत सीरीज होने के बाबजूद मतदाताओं की नजर में वह क्यों नहीं चढ सकी। ...............
·         18मार्च2012- गडकरी पर नहीं बनी सहमति। नागपुर/ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में नितिन गडकरी को फिर से भाजपा की कमान सौंपने की संघ मंशा रास नहीं आ रही है। वे संजय जोशी को संगठन महामंत्री का मौका देने के भी खिलाफ हैं।...................
·         16मार्च 2012- संघ म.प्र. सरकार की कार्यशैली से नाराज। नागपुर / भाजपा शासित राज्यों के संघ प्रचारकों ने पार्टी नेताओं की कार्यशैली पर और खासतौर पर मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार को लेकर जिस तरह से नाराजगी जाहिर की, उससे इस बात की प्रबल सम्भावना है कि संघ इस बार भाजपा को लेकर बड़े फैसले ले सकता है। ...........
·         13मार्च2012- जनसत्ता सम्पादकीय- संघ का शिकंजा.........लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद संघ के सरसंघ संचालक मोहन भागवत ने पार्टी नेताओं को तलब करने से पहले सीधे संवाददाता सम्मेलन बुला कर नसीहत दी थी, और पार्टी अध्यक्ष को बदलने की जरूरत रेखांकित ही नहीं की थी अपितु बदल भी दिया था। विधानसभा चुनावों में मिली ताजा हार के बाद उन्होंने फिर से सार्वजनिक रूप से नेतृत्व बदलने की जरूरत बतायी। ...... गुजरात भाजपा इकाई में खींचतान और विद्रोह के बाबजूद भी मोदी बचे रहे तो उसकी बड़ी वजह संघ का उन पर वरद हस्त का होना था।  
इन समाचारों और विचारों से भाजपा पर संघ के नियंत्रण का पता चलता है, पर भाजपा में उफन रहे भ्रष्टाचार और दौलत से चुनाव संचालन के कारण भाजपा के नेताओं की संघ पर निर्भरता कम होती जा रही है और उनमें संघ से स्वतंत्र होने की छटपहाटें दिखायी देने लगी हैं।
कुछ नमूने देखिए-  
·         राजस्थान में वसन्धुरा राजे ने जिन गुलाब चन्द्र कटारिया की जन जागरण यात्रा को रुकवाया वे संघ के कट्टर स्वयं सेवक रहे हैं और राजस्थान में सरकार बनने के बाद भले ही दिखावटी मुख्यमंत्री का पद वसन्धुरा राजे को दिया गया था पर गृहमंत्री जैसा महत्वपूर्ण पद संघ ने उन्हें ही दिलवाया था। भैरोंसिंह शेखावत के उपराष्ट्रपति पद पर चुने जाने के बाद विपक्ष के नेता पद पर उन्हें ही प्रतिष्ठित किया गया था। भाजपा सरकार के दौर में वे मुख्यमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार माने जाते थे। उनकी यात्रा पहले संघ और फिर पार्टी से अनुमति लेने के बाद ही निकाली जा रही थी पर पद जाने की आशंकाओं से ग्रस्त वसुंधरा ने उन्हें चुनौती देकर और 59 विधायकों से त्यागपत्र लिखवा कर सीधे सीधे संघ को चुनौती दे दी है। वसन्धुरा की माँ विजयाराजे सिन्धिया ने काँग्रेस से नाराज होने के कारण बदला लेने के लिए भाजपा को अटूट साधन उपलब्ध कराये थे जिसकी बदौलत ही भाजपा[पूर्व जनसंघ] अपना आधार तैयार कर पायी थी। अडवाणी पीढी के लोग अब भी उनसे उपकृत महसूस करते हैं। विधानसभा में विपक्ष के नेता पद पर नियुक्ति के संघर्ष में वे पहले ही भाजपा और संघ नेताओं को नाकों चने चबवा चुकी हैं।
·         मध्यप्रदेश में आरएसएस के आनुषांगिक संगठन किसान संघ ने संघ से अनुमति लिये बिना पहले ही मुख्यमंत्री निवास घेर लिया था, और कुछ आश्वासन लेकर ही वापिस लौटे थे। इस बार पहले तो एक धरने के दौरान किसान संघ और आरएसएस कार्यकर्ताओं के बीच बकायदा मारपीट हुयी और एक दूसरे के खिलाफ रिपोर्टें लिखवायी गयीं वहीं गैंहू खरीद के मामले में किये गये चक्काजाम के बाद पुलिस ने न केवल गोली चलायी अपितु एक किसान को गोली मार कर उसकी लाश का आनन फानन में अंतिम संस्कार भी करवा दिया। इसके साथ ही किसान संघ के अध्यक्ष और महासचिव को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया। इस बीच भले ही उन्होंने एक जेबी पदाधिकारी बना कर भ्रम उत्पन्न करने की कोशिश की हो, किंतु प्रदेश में किसान संघ के संघर्षशील नेता ही अभी भी किसान संघ के किसानों की पहली पसन्द के नेता हैं। संघ के इशारों पर प्रदेश अध्यक्ष द्वारा किसान संघ के लोकप्रिय अध्यक्ष को ब्लेकमेलर कहा गया और संघ में कई अनियमितताओं के आरोप लगाये। ऐसे में संघ और किसानों के बीच टकराव तय है।
·         कर्नाटक में येदुरप्पा ने स्वयं को मुख्यमंत्री बनाने की माँग लेकर न केवल धमकी दी अपितु अपने पक्ष के विधायकों और मंत्रियों के त्यागपत्र भी ले के रख लिये। येदुरप्पा पहले कभी संघ के स्वयं सेवक रहे थे किंतु सत्ता का स्वाद चखने के बाद वे रेड्डी बन्धुओं की शह पर खुली बगावत पर उतारू हैं। संघ सत्ता की ओट में काम करने का अभ्यस्त हो चुका है और वह किसी भी तरह दक्षिण के इकलौते राज्य में संकीर्ण और जुटाये गये बहुमत से प्राप्त सत्ता खोना नहीं चाहता। यदि वह सैद्धांतिक आधार पर सत्ता दाँव पर लगाता है तो विभाजन तय है। इसके विपरीत जाने पर देश भर में स्वयं सेवक और समर्थक संघ में आस्था खो देंगे।
·         गुजरात में नरेन्द्र मोदी को केशुभाई ने खुली चुनौती दी है जबकि संघ मोदी के साथ है। संघ के कृपापात्र भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी और स्वयं को प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी समझने वाले नरेन्द्र मोदी एक दूसरे को फूटी आँख नहीं देखना चाहते। ऐसे में संघ को अपनी पक्षधरता तय करनी पड़ेगी।
      इसी तरह हिमाचल में शांता कुमार बनाम धूमल, उत्तराखण्ड में निशंक बनाम खण्डूरी बनाम कोशियारी उत्तरप्रदेश में योगी, बनाम, राजनाथ सिंह, बनाम लालजी टण्डन, बनाम कटियार, बनाम कलराज मिश्र के साथ अब मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और चुनावों में मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित उमाभारती के साथ वरुण गान्धी मनेका गान्धी के बीच चल रहे द्वन्द में संघ को चुनाव करना पड़ रहा है और इस चुनाव के बाद उसकी ताकत का कमजोर होना तय है। गठबन्धन वाली सरकारों में तो क्षेत्रीय दल इस राष्ट्रीय दल के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करते हैं और संघ की छाया से भी बचते हैं। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि संघ की कूटनीति अब संकट में घिर गयी है। तभी पिछले दिनों संघ ने विधानसभा चुनावों के पूर्व झुंझला कर कहा था कि भाजपा हार जाये तो अच्छा और बिल्कुल से हार जाये तो बहुत अच्छा।  
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629

Thursday, May 10, 2012

प्रमुख दलों में खुली अनुशसनहीनता के खतरे


प्रमुख दलों में खुली अनुशासन हीनता के खतरे
                                                                        वीरेन्द्र जैन
                वैसे फुटकर समाचार तो आते ही रहते थे किंतु जब एक साथ एक ही दिन एक ही राज्य से दो राष्ट्रीय दलों में खुली अनुशासन हीनता, रोने गाने, मारपीट और कपड़ों के फटने के समाचार मुखपृष्ठ पर एक साथ आये तो इस पर विषयगत की जगह वस्तुगत रूप में विचार करना जरूरी हो गया। गत दिनों राजस्थान से समाचार आये कि प्रदेश भाजपा में कोर कमेटी की बैठक में से बाहर निकल कर पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान में विपक्ष की नेता वसन्धुरा राजे सिन्धिया ने पार्टी से त्यागपत्र देने का विचार व्यक्त करते हुए कहा कि वे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को पार्टी के सदस्यों की भावना से प्रभावित कर पाने में असमर्थ रही हूं इसलिए त्यागपत्र देने का विचार कर रही हूं। कुछ ही देर बाद पार्टी के 58 विधायकों और दो निर्दलीय विधायकों ने उन्हें अपने त्यागपत्र सौंप दिये। खबर के अनुसार इससे पहले बैठक में बहुत उत्तेजक बहस हुयी और इसी बीच राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने फोन पर संघ के नजदीकी गुलाब चन्द कटारिया की प्रस्तावित जनजागरण यात्रा का समर्थन करते हुए तिथि भी तय कर दी , इससे वसन्धुरा राजे सिन्धिया बिफर गयीं। उनका विश्वास है कि इस तरह की यात्रा का नेतृत्व करने वाला मुख्यमंत्री पद का दावेदार भी बन सकता है इसलिए उनके अलावा किसी और के नेतृत्व में यह यात्रा नहीं होना चाहिए। उल्लेखनीय यह है कि भाजपा की मातृपितृ संस्था आरएसएस कटारिया के नेतृत्व में यात्रा के पक्ष में थी, क्योंके वे संघ के समर्पित स्वयं सेवकों में माने जाते हैं।
      दूसरी ओर राजस्थान के ही भरतपुर में उसी दिन कांग्रेस की सम्भागीय कार्यशाला चल रही थी जिसमें पूर्व सांसद विश्वेन्द्र सिंह और उनके समर्थकों ने कई पदाधिकारियों की लात घूंसों से पिटायी कर दी व कपड़े फाड़ दिये और प्रदेश अध्यक्ष डा. चन्द्रभान समेत मंचासीन लोग देखते ही रह गये। पूर्व राज परिवार से सम्बन्धित उक्त पूर्व सांसद ने भी पार्टी कार्यकर्ताओं के असंतुष्ट होने का बहाना बनाते हुए कहा कि भरतपुर में पार्टी के अध्यक्ष का पद एक ऐसे व्यक्ति को सौंप दिया गया है जिसकी भाजपा नेताओं से गहरी सांठ गाँठ है, व जो हत्या के मामले में आरोपी रह चुके हैं। उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष को भी प्रदेश अध्यक्ष मानने से इंकार करते हुए कहा कि वे उनके नेता नहीं हैं। उनके नेता तो सोनिया गाँधी और अशोक गहलोत हैं।
      इससे कुछ दिन पूर्व ही उत्तरप्रदेश में भी नवनिर्वाचित समाजवादी पार्टी के शपथ ग्रहण समारोह के अवसर पर सैकड़ों युवा मंच पर चढ गये थे और उन्होंने जंग जीतने जैसे उत्साह में न केवल मंच की शोभा अपितु समारोह की गरिमा को भी नष्ट भ्रष्ट कर दिया था। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद से ही कानून व्यवस्था समाजवादी पार्टी के युवाओं की मर्जी से चल रही है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की अपीलें भी कुछ काम नहीं कर पा रही हैं।
      स्मरणीय है कि कुछ ही दिन पहले कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री येदुरप्पा ने अपने पक्ष के विधायकों की एक बैठक बुला कर स्वयं को पुनः मुख्यमंत्री बनवाने का प्रस्ताव पास किया था व राष्ट्रीय नेतृत्व को लगभग धमकाने वाले अन्दाज में चेतावनी दी थी कि एक खास तिथि तक उन्हें मुख्यमंत्री बनवा दें अन्यथा दक्षिण में भाजपा की इकलौती सरकार गिरने के लिए वे स्वयं जिम्मेवार होंगे। झारखण्ड के राज्य सभा चुनाव में भाजपा के लिए विदेश से डालरों में धन जुटाने वाले अंशुमान मिश्र की उम्मीदवारी से बौखलाये यशवंत सिन्हा ने उनकी उम्मीदवारी न बदलने की दशा में पार्टी छोड़ देने की धमकी दी थी जिससे केन्द्रीय नेतृत्व घबरा गया और प्रत्याशी बदल दिया जिसके परिणाम स्वरूप उनकी सरकार होते हुए भी उनका उम्मीदवार चुनाव हार गया। अभी हाल ही में दिल्ली नगर निगम के चुनाव में भाजपा का टिकिट चाहने वाले एक उम्मीदवार ने दूसरे को गोली मार दी थी।
      वाय एस रेड्डी की एक दुर्घटना में मृत्यु के बाद जगनमोहन रेड्डी द्वारा अपने दल के आदेशों के खुले उल्लंघन के बाद पार्टी छोड़ देने के बाद आन्ध्र प्रदेश में अस्थिरता बढ गयी है, व पहले से जारी पृथक तेलंगाना आन्दोलन और अधिक तीव्र हो गया है। कांग्रेस के सांसद भी अपनी ही सरकार के खिलाफ सदन में नारेबाजी कर रहे हैं और अनुशासनहीनता में उन्हें सदन से निलम्बित करना पड़ रहा है। उत्तराखण्ड में कांग्रेस हाईकमान द्वारा तय किये गये मुख्यमंत्री प्रत्याशी के खिलाफ कांग्रेस के ही दूसरे नेता ने खुला विद्रोह कर दिया था जिसे बमुश्किल मनाया जा सका। तृणमूल कांग्रेस ने अपने ही दल के रेल मंत्री के रेल बजट के बहाने उन्हें रेल मंत्री पद से हटाने की जिद ठान ली जिस निर्णय के विरोध में एक दूसरे सांसद ने ममता बनर्जी के खिलाफ झंडा उठा लिया और गीत लिख डाला। डीएमके में करुणानिधि के दोनों बेटों में उत्तराधिकार के लिए तीखी जंग चल रही है जो बहुधा हिंसक हो जाती है। शिवसेना तो दो भागों में विभाजित ही हो चुकी है, अकाली दल में से मनप्रीत सिंह बादल को भले ही चुनावी सफलता न मिली हो किंतु अकाली दल में रन्ध्र तो हो ही चुका है। अपने अनुशासन के लिए जाने जाने वाले बामपंथी दलों में भी राष्ट्रीय कांग्रेस के अवसर पर पोलित ब्यूरो सदस्य अनुपस्थित पाये जाने लगे हैं।
      विचारणीय यह है कि अनुशासनहीनता की यह बाढ क्यों आ गयी है, और जिन दलों या गठबन्धनों में अपना अनुशासन ही न हो उनसे अपने कार्यक्रम या घोषणाओं के पूरी होने की उम्मीद कैसे लगायी जा सकती है। इसका प्रणाम अभी हाल ही में मिला जब वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने संतुलित शब्दों में कहा कि गठबन्धन सरकारों में कार्यक्रम लागू करने में विलम्ब होता है।
      दर असल हमने अपने लोकतंत्र को लोगों की आकांक्षाओं के शासन की जगह उनके ऐसे वोटों का शासन बना दिया है जो उनकी आकांक्षाओं का प्रदर्शन नहीं करते अपितु वे वोट किसी लालच, दबाव, भ्रम, धोखे, भावुकता, या अज्ञानता से गिरवा लिये जाते हैं। ऐसा करने के लिए विचार, सिद्धांत, कार्यक्रम, या घोषणापत्रों की जगह, चुनावों के दौरान कुछ सेलीब्रिटीज, कुछ साम्प्रदायिकता, कुछ जातिवाद, कुछ भाषावाद, कुछ क्षेत्रवाद, आदि का प्रयोग कर लिया जाता है। चुने हुए प्रतिनिधि विशिष्ट प्रतिनिधि बन जाते हैं जो न केवल अपनी सुख सुविधाओं को ही बढाते रहते हैं, अपितु अपनी विशिष्ट स्थिति से नये नये धन्धे करते हैं, या पुराने धन्धों का विस्तार करते हैं। इस अर्जित विशिष्टता से वे अपनी गैरकानूनी और आपराधिक गतिविधियों में सुरक्षा पाते हैं। यही कारण है कि गैरकानूनी धन्धा करने वाले लोग ज्यादा से ज्यादा सत्ता की सम्भावनाओं वाले दलों से जुड़ने की कोशिश करने लगे हैं और ये खोटे सिक्के असली सिक्कों को बाजार से बाहर करने लगे हैं। सदनों में आज तीन चौथाई करोड़पति पहुँचने लगे हैं जो समाज सेवा की भावना से नहीं अपितु अपने व्यावसायिक लाभ या सम्पत्ति की सुरक्षा के लिए वहाँ जाना चाहते हैं। चुने जाने के बाद वे सदन में नजर नहीं आते और ना ही बहसों में भाग लेने की कोशिश ही करते हैं। ऐसे लोग अपनी या अपने पक्ष के लोगों की उम्मीदवारी और चुनाव सुनिश्चित करने के लिए कुछ भी करने से नहीं चूकते। अरविन्द केजरीवाल और बाबा रामदेव द्वारा भले ही प्रतिवाद द्वारा सुर्खियों में आने के लिए सांसदों के खिलाफ निन्दनीय भाषा का प्रयोग किया गया हो, किंतु यह भी समरण रखना होगा कि ऐसा इसलिए भी किया गया है क्योंकि जनता का एक बड़ा वर्ग भी ऐसे ही विचार रखता है।
      राष्ट्रीय दलों में अनुशासनहीनता दलों में विभाजन और अधिक से अधिक गठबन्धन वाली अस्थिर सरकारों की ओर ही ले जायेगी जिसका परिणाम देश के लिए अच्छा नहीं होगा, इसके लिए जरूरी होगा कि सत्ता की चिंता किये बिना राजनीतिक दल अपने सिद्धांतों और विचारों पर दृड़ संगठनों का निर्माण करें। अनुशासनहीनता किसी भी हालत में सहनीय न हो और सभी दलों को इसके लिए किसी कानून से बाँधा जाये। सदन की उम्मीदवारी या लाभ के पद के लिए पार्टी में वरिष्ठता की सीमा तय हो ताकि एक दल से निकाला हुआ अनुशासनहीन व्यक्ति लाभ के लिए दूसरे दल में आश्रय न पा सके। विशिष्ट पद पर बैठे व्यक्तियों का जीवन पारदर्शी हो और उन्हें व्यापार व्यवसाय की अनुमति न हो। उन पर लगे आरोपों के खिलाफ त्वरित जाँच और शीघ्र न्याय की व्यवस्था हो। विशिष्ट व्यक्तियों के विचलन पर दण्ड भी विशिष्ट होना चाहिए। इस मामले में हाल ही में दिये गये बंगारू लक्ष्मण के मामले में दिये गये फैसले की भावना से प्रेरणा ली जा सकती है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हाल ही में अधिकारियों को निष्पक्ष कठोर फैसले लेने की सलाह दी है जिसे केवल अधिकारियों तक सीमित न मान कर दलों के अध्यक्ष समेत प्रत्येक निर्णायक व्यक्ति के लिए जरूरी माना जाना चाहिए।
वीरेन्द्र जैन
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Monday, April 30, 2012

क्या बंगारू लक्षमण अकेले जिम्मेवार हैं?


क्या बंगारू लक्षमण अकेले जिम्मेवार हैं?
वीरेन्द्र जैन
                भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री बंगारु लक्षमण एक बार फिर जेल में हैं। इससे पहले वे 1975 में इमरजैंसी में जेल में थे और जेल से वैसे ही बाहर आये थे जैसे कि संघ परिवार से जुड़े दूसरे लोग बाहर आये थे भले ही बाद में वे लोग अपने को दूसरी आजादी के सेनानी बतलाने लगे हों, और भाजपा शासित राज्यों में इस बात की पेंशन भी डकार रहे हों। पर देवरसजी द्वारा जेल से लिखी हुयी चिट्ठियाँ आज भी मौजूद हैं जिनमें श्रीमती इन्दिरा गान्धी की प्रशंसा करते हुए उनसे संघ की सेवाएं लेने का अनुरोध किया गया था। उत्तर भारत के हिन्दीभाषी क्षेत्रों तक केन्द्रित इस पार्टी की जन्मजात आकांक्षा अखिल भारतीय होकर देश पर राज्य करने की रही है इसलिए इसने समय समय पर पार्टी के अध्यक्ष का पद का मुकुट अपने चुनिन्दा नेताओं के सिर से उतार कर दक्षिण के नेताओं के सिर पर रखने की कोशिश की है। यह उनका दुर्भाग्य ही रहा है उनका यह प्रयोग सदैव ही असफल रहा है। बंगारू लक्षमन, वैंक्य्या नाइडू, जे एन कृष्णमूर्ति, आदि सभी न केवल असफल रहे हैं, अपितु अपना कार्यकाल भी पूरा नहीं कर सके हैं। वैंक्य्या नायडू को भी बड़े अपमान जनक तरीके से पद छोड़ने को मजबूर होना पड़ा था क्योंकि साध्वी की वेषभूषा धारण कर विचरण करने वाली सुश्री उमा भारती उनके साथ चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी से भी बुरा व्यवहार करती रहती थीं जिससे व्यथित होकर ही उन्होंने अध्यक्ष पद छोड़कर भागने में ही अपने सम्मान की सुरक्षा समझी थी। बिडम्बना यह रही कि पार्टी की इज्जत का ख्याल करते हुए उन्होंने अपने त्यागपत्र का कारण अपनी पत्नी की बीमारी बतलाया था पर इस झूठ का मखौल उड़ाते हुए अति मुखर उमाभारती ने पार्टी को पत्र लिखा था कि वैंक्य्या ने अपनी पत्नी की रजोनिवृत्ति को राष्ट्रीय बीमारी बना दिया। हास्यास्पद यह भी रहा कि लाल कृष्ण अडवाणी के हनुमान कहलाने वाले वैंक्य्या नायडू ने अगले अध्यक्ष की कार्यकारिणी में उपाध्यक्ष का पद स्वीकार कर लिया। लोग उनकी पत्नी की बीमारी की खबर ही पूछते पूछते रह गये।
      बंगारू लक्षमण का स्टिंग आपरेशन किया गया था जिसमें उन्होंने ऐसे रक्षा उपकरण की आपूर्ति के लिए एक लाख रुपये ग्रहण किये जो उपकरण अस्तित्व में ही नहीं था। राष्ट्रभक्ति का चन्दन माथे पर लगाये फिरने वाली और बड़े बड़े मौखिक दावे करने वाली पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने यह भी जानने की जरूरत नहीं समझी थी कि कथित उपकरण से कहीं राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कोई खतरा तो नहीं होगा। रुपयों के लिए बिना कोई रसीद जारी किये हुए वे अगली बार डालरों में देने का आग्रह करते देखे गये। उक्त राशि उन्होंने पार्टी के कार्यालय में राष्ट्रीय अध्यक्ष के कक्ष में बैठकर स्वीकार की इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि यह उनका व्यक्तिगत मामला है। जब कोई मीडियावाला किसी को स्टिंग आपरेशन के लिए चुनता है तो इतना तो तय होता है कि उसके पास इस तरह के लेन देन की सूचनाएं पहले से ही रहती हैं अर्थात यह बंगारू लक्षमन की कोई पहली घटना नहीं रही होगी, अपितु वे इसके लिए चर्चित रहे होंगे। उल्लेखनीय है कि वे अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में रेल राज्य मंत्री हुआ करते थे और तत्कालीन रेल मंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री से उनकी शिकायत करते हुए कहा था कि वे अपने कार्यालय में बैठ कर दस पाँच हजार जैसी मामूली राशि की रिश्वत भी लेने में संकोच नहीं कर रहे थे।           उसके बाद ही उन्हें उक्त पद से मुक्त करके राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया था।
      क्या भाजपा के पास पार्टी संचालन और चुनाव कोष की कोई घोषित नीति या आय अधारित लेवी प्रणाली है? और यदि है तो क्या उसका पालन करते हुए ही कोष एकत्रित किया जाता है? यदि नहीं तो क्या यह स्वाभाविक नहीं है कि पार्टी पदाधिकारी इसी तरह काला सफेद करके पार्टी कोष एकत्रित करते होंगे। यह भी सम्भव है कि इस बेतरतीब ढंग से कोष संचयन की प्रक्रिया में संचयनकर्ता पार्टी के नाम पर अपने लिए भी कुछ कर लेने से पीछे नहीं हटते होंगे।
      जब श्री बंगारू लक्षमन को सजा हुयी तो भाजपा ने कहा कि इससे पार्टी का कुछ भी लेना देना नहीं है क्योंकि ये बंगारू के निजी आचरण का मामला है, किंतु साक्ष्य उनकी बात के खिलाफ हैं। स्मरणीय है तहलका के स्टिंग आपरेशन के बाद हुयी भाजपा संसदीय बोर्ड की बैठक के बाद तत्कालीन पार्टी प्रवक्ता वीके मल्होत्रा ने कहा था बैठक में पार्टी सांसदों और घटक दलों के सदस्यों को कहा गया है कि उन्हें इस मामले में रक्षात्मक[डिफेंसिव] होने की जरूरत नहीं है, उन्हें इससे आक्रामक रूप से निपटना होगा क्योंकि न तो कोई रक्षा सौदा हुआ है और न ही किसी मंत्री पर इसमें शामिल होने का आरोप लगा है। जब उनको ध्यान दिलाया गया कि उन्होंने स्वयं ही धन लेने की बात स्वीकारी है तो श्री मल्होत्रा ने कहा था कि यह धन पार्टी कोष के लिए लिया गया था। पर इसी समय जब उनसे पूछा गया था कि क्या उक्त राशि को पार्टी कोष में जमा कर दिया गया है तो उन्होंने कोई जबाब देना उचित नहीं समझा था। स्मरणीय है पिछले दिनों जब पार्टी कार्यालय से डेढ करोड़ रुपये गायब पाये गये थे तब उन्होंने एक प्राइवेट एजेंसी से उसकी जाँच करायी थी पर पुलिस में रिपोर्ट लिखाना जरूरी नहीं समझा था। स्पष्ट है कि पार्टी में इसी तरह से बेनामी कोष तैयार होता होगा किंतु जब कोई ऐसे किसी अपराध में पकड़ा जाता है तो पार्टी तुरंत अपना पल्ला झाड़ लेती है। कर्नाटक के खनन माफिया रेड्डी बन्धुओं को गिरफ्तार किया गया था तब उन्हें आशीर्वाद देते रहने वाली सुषमा स्वराज ने उनसे अपना पल्ला झाड़ लिया था और गेंद दूसरों के पाले में फेंक दी थी। ठीक इसी तरह मध्य प्रदेश के एक अधिकारी की सन्दिग्ध मृत्यु के मामले में भोपाल के एक विधायक पर छींटे आते ही उन्होंने उससे कोई सम्बन्ध न होने की घोषणा करके सबको आश्चर्य चकित कर दिया था जबकि मध्य प्रदेश में उनका स्थायी पता उसी विधायक के मकान का दिया गया था। उल्लेखनीय यह भी है कि इसे व्यक्तिगत मामला बतलाने वाली पार्टी ने इस दौरान सेना के पदाधिकारियों पर तो तुरंत कार्यवाही की थी किंतु श्री बंगारू लक्षमन पर कोई कार्यवाही नहीं की थी। यह कार्यवाही पर एफआईआर घटना के तीन साल बाद यूपीए सरकार ने दर्ज करायी जिस पर उक्त फैसला आया है।
      स्मरणीय यह भी है कि इस घटना के लिए जिस व्यक्ति को दोषी बताया जा रहा है उस व्यक्ति के तुष्टीकरण के लिए उसकी पत्नी को राजस्थान की एक सुरक्षित सीट से टिकिट देकर सांसद चुनवा दिया जाता है जबकि उक्त सम्मानीय महिला ने इससे पहले पार्टी में कोई भूमिका नहीं निभायी थी और श्रीमती सुशीला लक्षमन बंगारू सिकन्दराबाद के स्कूल में अध्यापन का कार्य कर रही थीं। खेद है कि देश पर शासन करने का सपना देखने वाली यह पार्टी एक ओर तो यह कह रही है कि ये मामला उनका व्यक्तिगत है वहीं दूसरी ओर कह रहे हैं कि फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील करने का अधिकार है अर्थात यदि कानून के रन्ध्रों से निकलने का मौका मिल जाये तो उन्हें कोई नैतिक परेशानी नहीं है।
      सच तो यह है इस मामले में श्री बंगारू लक्षमन अकेले दोषी नहीं हैं अपितु पूरी पार्टी ही इसमें सम्मिलित है। इस फैसले में विद्वान न्यायाधीष ने अपनी टिप्पणी में न केवल व्यक्ति बंगारू को सजा सुनायी है अपितु भ्रष्टाचार को सहज स्वीकृति देने वाले समाज के सभी हिस्सों को झकझोरा है और यह फैसला न केवल भाजपा अपितु भ्रष्टाचार में लिप्त सभी क्षेत्रों के लिए है।
वीरेन्द्र जैन
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Tuesday, April 24, 2012

ममता बनर्जी की सनक और देश का भविष्य


ममता बनर्जी की सनक और देश का भविष्य
वीरेन्द्र जैन
      श्री आर के लक्ष्मण दुनिया के ऐसे अनोखे कार्टूनिस्टों में से एक हैं जिन्होंने लगातार 60 सालों से अधिक एक अखबार के प्रथम पृष्ठ पर कार्टून बनाने का रिकार्ड कायम किया है। जब उनके इस काम के पचास साल पूरे हुए थे तब एक पत्रकार ने उनका साक्षात्कार लिया था। इस साक्षात्कार में अन्य प्रश्नों के अलावा जब उन्होंने राजनीतिज्ञों के साथ उनके अनुभवों के बारे में प्रश्न किये तब उनका कहना था कि हमारे काम में बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु बहुत मनहूस साबित हुए हैं। जब पत्रकार ने प्रश्न किया कि वो कैसे, तो उनका उत्तर था कि उन्होंने मुझे आज तक कार्टून बनाने का मौका नहीं दिया।
      आज उसी बंगाल राज्य के उसी पद पर सुश्री ममता बनर्जी बैठी हैं जो पिछले महीने भर से अपनी अजब अजब सनकों के कारण न केवल अखबारों की सुर्खियों में हैं अपितु उनके बारे में कार्टूनों की बाढ आ गयी है। उल्लेखनीय यह है कि उनकी चुनावी विजय का मूल आधार तत्कालीन सत्त्तारूढ गठबन्धन के खिलाफ एंटी इनकम्बेंसी और कांग्रेस से उनका गठबन्धन हो जाना था। इस चुनाव के दौरान जिन बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, कलाकारों, ने उनका समर्थन किया था वे सब या तो विरोध में बोल रहे हैं या अपना मुँह छुपाते फिर रहे हैं। बाममोर्चे की खिलाफत करने के लिए उन्होंने जिन तस्लीमा नसरीन की पक्षधरता की थी उन्हीं की पुस्तक का लोकार्पण उन्होंने कोलकता पुस्तक मेले में नहीं होने दिया। बलात्कार की सच्ची घटना को प्रतिपक्ष का षड़यंत्र बताने जैसा बेतुका बयान दिया और जब पुलिस अफसर ने उसकी जाँच कर उसे सत्यापित किया तो उस अफसर का तबादला कर दिया। अपनी ही पार्टी के रेल मंत्री को बजट पेश करने के बाद हटने के लिए मजबूर किया व गठबन्धन की मजबूरी के कारण केन्द्र सरकार को इस बात के लिए विवश किया कि वे उनके द्वारा नामित व्यक्ति को रेलमंत्री बनायें। स्मरणीय है कि कथित सांसद जब रेल मंत्रालय में उपरेलमंत्री था तब असम में घटित एक रेल दुर्घटना के बाद उसने दुर्घटना स्थल पर जाने के प्रधानमंत्री के आदेश को मानने से इंकार कर दिया था। एक प्रोफेसर को ममता बनर्जी के खिलाफ कार्टून बनाने पर गिरफ्तार कर लिया गया व तृणमूल कार्यकर्ताओं द्वारा उसके साथ मारपीट की गयी जिसका पुलिस ने कोई नोटिस नहीं लिया।
      ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी के सदस्यों को आदेशित किया कि माकपा सदस्यों के परिवार में वैवाहिक रिश्ते न जोड़ें और न ही उनके यहाँ आयोजित वैवाहिक कार्यक्रमों में शामिल हों। सरकारी सहायता प्राप्त पुस्तकालयों को आदेशित किया है कि वे उनके द्वारा बताये हुए अखबार और पत्र पत्रिकाएं ही मंगायें।बंगाल की जनता को वे फतवा जारी करती हैं कि वे टीवी पर समाचार नहीं केवल गीत सुनें। समाचारों के लिए वे अपना अखबार और टीवी चैनल प्रारम्भ करने जा रही हैं। पाठ्यक्रमों से दुनिया के प्रमुख दार्शनिक मार्क्स को हटाये जाने की हास्यास्पद घोषणा करती हैं। वे आतंकवाद के खिलाफ राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक में नहीं आयीं और केन्द्र सरकार को अल्टीमेटम दे रही हैं कि उनके राज्य पर जो कर्ज है उसके ब्याज के 2400 करोड़ रुपये माफ कर दें। ऐसा न करने पर वे प्रत्यक्ष में सरकार और परोक्ष में देश को अस्थिरता की ओर धकेल सकती हैं। अपनी सरकार पर लगे प्रत्येक आरोप का दोष वे पिछली बाम मोर्चा सरकार पर मढती हैं, यहाँ तक कि एक अस्पताल में आग लग जाने की घटना की जिम्मेवारी भी वे सीपीएम पर डालते हुए कहती हैं कि यह वही अस्पताल है जिसमें ज्योति बसु का इलाज हुआ था।
      आज बिना कारण हटाये गये रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी ही नहीं अपितु नक्सली पृष्ठभूमि से उनकी पार्टी में आये हुए सांसद कबीर भी उनके खिलाफ गीत लिख रहे हैं। बंगाल के बुद्धजीवी और लेखक कलाकार महाश्वेतादेवी, शंख घोष, शुभ प्रसन्न, जोगेन चौधरी, सांवली घोष जैसे बड़े नाम वाले ही नहीं अपितु चुनाव में उनका समर्थन करने वाले हजारों की संख्या में दूसरे लेखक भी ममता बनर्जी से उम्मीदें छोड़ विरोध में उतर आये हैं। ममता के समर्थन में एक ओर तो बंगाल का पूंजीपति जमींदार तबका था तो दूसरी ओर माओअवादियों का समर्थन था पर माओवादियों के नेता किशनजी के मारे जाने के बाद और पूंजीपति वर्ग की उम्मीदें जल्दी पूरी न होने के कारण उनके दोनों ही आधार खिसक रहे हैं। कांग्रेस को धमकाते रहने के कारण उनका स्थानीय  गठबन्धन सदा खतरे में रहता है और केन्द्र सरकार पर बेतुका दबाव बनाने के कारण केन्द्र सरकार भी परेशान है।
      ममता बनर्जी की ये हरकतें वैसे कुछ नयी नहीं हैं। उनके राजनीतिक जीवन का पूरा कार्य ही ऐसी ही सनकों से भरा पड़ा है। स्मरणीय है कि ममता बनर्जी ने अपनी राजनीति बंगाल में काँग्रेस पार्टी की छात्र शाखा की सदस्यता से ही शुरू की थी तथा अपने जुझारूपन से पायी लोकप्रियता के आधार पर उन्होंने उस समय के वरिष्ठ नेता सोमनाथ चटर्जी को भी जादवपुर लोकसभा क्षेत्र से पराजित किया था। 1991 की नरसिंहराव की सरकार में उन्हें मानव संसाधन विकास, युवामामले और खेल मंत्रालयों में राज्यमंत्री बनाया गया था। बाद में बंगाल के नेताओं के साथ मतभेदों के चलते केन्द्र की खेल विभाग की मंत्री होते हुये भी कलकता के ब्रिग्रेड मैदान में उस रैली का नेतृत्व किया था जो केन्द्र सरकार द्वारा खेलों के विकास पर ध्यान देने के विरोध में बुलायी गयी थी, इसी कारण 1993 में उन्हें मंत्री पद से मुक्त कर देना पड़ा था। वे बंगाल के काँग्रेस नेताओं को वहाँ की सीपीएम सरकार का पिछलग्गू बता कर सार्वजनिक निंदा करती थीं। उनके जीवन का इकलौता लक्ष्य बंगाल की सीपीएम सरकार का तीव्र विरोध करना रहा है और कांग्रेस के जिम्मेवार नेतृत्व को वे हमेशा कमजोर बताती रही हैं। 1996 में उन्होंने नारा दिया कि वे बंगाल में विरोध की इकलौती आवाज हैं तथा एक साफसुथरी काँग्रेस चाहती हैं। 1996 में उन्होंने कलकता में अलीपुर में आयोजित एक रैली में एक काले शाल को अपने गले में कस लिया था और फाँसी लगा लेने की धमकी दी थी। जुलाई 96 में पैट्रोलियम पदार्थों की दरों में वृद्धि के खिलाफ वे गर्भगृह में उतर आयी थीं जबकि उस समय वे सरकार चलाने वाली पार्टी में ही थीं। इसी तरह महिला आरक्षण विधेयक के सवाल पर उन्होंने लोकसभा के गर्भगृह में जाकर समाजवादी पार्टी के एक सांसद का गला पकड़ लिया था। फरबरी 1997 में उन्होंने रेलवे बजट में बंगाल के लिए रेल की समुचित सुविधाएं देने के आरोप में तत्कालीन रेल मंत्री रामविलास पासवान पर अपना शाल फेंक कर मारा था और अपने त्यागपत्र की घोषणा कर दी थी। लोकसभा अध्यक्ष पी संगमा ने उनका स्तीफा स्वीकार नहीं किया था तथा माफी मांगने को कहा था बाद में संतोषमोहन देव की मध्यस्थता पर वे वापिस लौटी थीं। अंतत: 1997 में उन्होंने बंगाल की काँग्रेस पार्टी में विभाजन करके आल इंडिया तृणमल काँग्रेस बना ली थी। इतना ही नहीं 1999 में कॉग्रेस पार्टी की धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा की विरोधी भाजपा सरकार में सम्मिलित हो गयीं रेल मंत्री ही बन कर रहीं। समर्थन के लिए मजबूर अटल बिहारी की सरकार को उनकी शतें माननी ही पड़ीं। मंत्री बनते ही उन्होंने अपने पहले रेल बजट में बंगाल के लोगों से किये बहुत सारे वादे पूरे कर दिये जबकि देश के दूसरे हिस्से कुछ जरूरी मांगों की पूर्ति से वंचित रह गये। उन्होंने बंगाल के लिए नई दिल्ली सियालदहा राजधानी एक्सप्रैस, हावड़ा पुरलिया, सियालदहा न्यूजलपाईगुड़ी, शालीमार बांकुरा, पुणे हावड़ा आदि गाड़ियां चलायीं अनेक के क्षेत्र में विस्तार किया। 2001 में भाजपा पर आरोप लगाते हुये उन्होंने राजग सरकार छोड़ दी। बाद में 2004 में वे फिर से सरकार में सम्मिलित हो गयीं कोयला मंत्रालय स्वीकार कर लिया। 2004 के लोकसभा चुनाव में वे तृणमूल काँग्रेस की ओर से जीतने वाली इकलौती सांसद थीं। अक्टूबर 2006 में उन्होंने बंगाल में घुसपैठियों की पहचान के सवाल पर अपना स्तीफा लोकसभा के उपाध्यक्ष चरण सिंह अटवाल के मुंह पर दे मारा था। देश के सबसे गम्भीर नेता ज्योति बसु उन्हें नौटंकी कहते थे।
चिंता का विषय यह है कि गठबन्धन के दूसरे दलों के सदस्यों के नेताओं पर की जा रही भ्रष्टाचार विरोधी कार्यवाही से वे दल भी बेचैन हैं और ऐसे में ममता पर केन्द्र सरकार की निर्भरता बढ गयी है। यदि वे बार बार बचकाने दबाव डालती रहीं तो मध्यावधि चुनाव के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं बचेगा जो देश पर अनावश्यक बोझ होगा। यदि तृणमूल कांग्रेस पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र विकसित हो तो वो ममता की मनमानी पर अंकुश लगा कर देश का नुकसान बचा सकती है।
वीरेन्द्र जैन
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